हमारी विरासत

परंपरा का सम्मान
मानवता की सेवा

" संत श्री रणधीर जी बाबल के कालातीत ज्ञान में निहित, हम जरूरतमंदों के लिए आशा के पुल बनाते हैं।"

अध्याय 1

गुरु मिलन और दीक्षा

रणधीर जी बाबल बाबलसर गाँव के जाट थे। वि.स. 1541 मारवाड़ में भयंकर अकाल पड़ा तब वे अपने परिवार सहित मालवा जा रहे थे। तब इसी रास्ते में गुरु महाराज श्री के सम्पर्क में आये और उनके शब्दोपदेश सुने तत्पश्चात बिश्‍नोई पंथ में दीक्षित हो गये। रणधीर जी बाबल ने वि.स. 1542 में पड़ियाल गांव (फलोदी) बसाया था। कालान्तर में वे एवं उनका परिवार पड़ियाल में रहने लगे। वहीं से वे गुरु जाम्भोजी के पास उनकी वाणी सुनने समराथल आने लगे। धीरे-धीरे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से निवृत्त होकर स्थाई रूप से गुरूजी के पास ही समराथल रहने लगे। रणधीरजी बाबल हमेशा अपने गुरूजी के साथ ही धर्म नियमों के प्रचारार्थ एवं गुरूजी के शब्दोकथन की शिक्षार्थ आम लोगों के साथ रहकर उन्हें ज्ञान देते, हवन पूजा करते, उन्हें जागृत करते स्वयं भी साखी कथन एवं आरतियों द्वारा अपने गुरूजी के प्रति श्रद्धा प्रकट करते थे।

अध्याय 2

पोशाक प्रसंग और महंत पद

गुरु जाम्भोजी ने अपने चार प्रमुख शिष्यों को विभिन्न पोशाकें प्रदान की: "रेडो जी काली पोशाका, किये महन्त सिर पर कर रखा। लाल पोशाका महन्त न्यालो, जम्भगुरु आज्ञा में चालो। रणधीर जी भगवें के महन्ता, मदी दीन्ही सब मिल संतां। चौथी मदी श्वेत पोशाका, आपणै पास लीवी हर सखा।" इस तरह गुरु जी ने रणधीर जी को भगवां भेष दिया और उन्हें पास बुलाकर कहा - "रणधीर जी कूँ पास बुलायो, हंस कर गुरु ऐसे बतलावौ। तू ही मंहत रिद्धी को धनी, ल्यायो सिलम विसंभ तणी। ताँते विष को हर तू राखी, दई मुद्रका फिर आस भाखी। कर भोजन कर मुख पर फेरो, भये मुंदड़ो निज मृत्यु हेरो।" पुनः कवि कहता है कि मुकाम में जो महंत रणधीरा, आपने हाथ किये जम्भ पीरा। अर्थात् गुरु जाम्भोजी ने अपने पाटवी शिष्य रणधीर जी बाबल को रिद्धि-सिद्धि का धणी व मुकाम का महंत बनाया। रणधीर जी बाबल एक गृहस्थ थे और उनका परिवार भी था, और तत्पश्चात गुरु जाम्भोजी के सानिध्य में आने के बाद संत बन गए।

अध्याय 3

प्रथम आरती और आध्यात्मिक विचार

जाम्भोजी से सम्बन्धित रणधीर जी द्वारा रचित एक आरती मिलती है जो जाम्भाणी साहित्य की प्रथम आरती है। इस आरती से यह प्रकट होता है कि बिश्‍नोई पंथ सतयुग से चला आ रहा है। गुरु जाम्भोजी ने उस समय नृसिंह रूप में अवतार लिया था और अपने भक्त एवं अन्यों का उद्धार किया था। यहाँ वह रणधीर जी बाबल द्वारा रचित मूल आरती प्रस्तुत है:

music_note

मूल आरती (नृसिंह आरती)

आरती कीजे नृसिंह कंवर की, वेद विमल यश भावे मेरे स्वामी जी की।।

पहली आरती पहलाद उबारे, हिरणाकुश नख उदर बिदारे।

दूसरी आरती बावन सेवा, बलि के द्वारे पधारे हरि देवा।

तीसरी आरती वैकुण्ठ पधारे, सहस्त्रबाहु जी के कारज सारे।

चौथी आरती असुर संहारे, भक्त विभीषण लंक बैठाये।

पांचवीं आरती कंस पछाई, गोपियां ग्वाल सदा प्रतिपाले।

तुलसी के पात जो घट घट हीरा, हरि के चरण गुण गावै रणधीर।

* यह जाम्भाणी साहित्य की प्रथम आरती मानी जाती है।

अध्याय 4

दिल्ली यात्रा और लोदी शासक

गुरु जाम्भोजी के प्रादुर्भाव के समय दिल्ली पर लोदी वंश का अधिकार था। इस वंश के बहलोल लोदी, सिकन्दर लोदी और इब्राहिम लोदी तीन बड़े शासक हुए थे। इनमें सिकन्दर लोदी से गुरु जाम्भोजी का सम्पर्क हुआ। गुरु जाम्भोजी की दिल्ली यात्रा के समय उनके प्रिय शिष्य रणधीर जी बाबल साथ थे। एक बार गुरु जाम्भोजी जब अपने शिष्यों हासम-कासम दर्जियों को छुड़ाने दिल्ली गये थे, तब रणधीर जी बाबल उनके साथ गये थे। वे हमेशा अपने गुरू की सेवा में तत्पर रहते थे।

चमत्कारिक इतिहास

पुर साथरी का इतिहास

गुरु जाम्भोजी एवं संत रणधीर जी का जीवंत चमत्कार

temple_hindu

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान मालवे से भ्रमण करते हुये अपनी जमात के साथ शिष्य रणधीर जी के सहित सबसे पहले पुर गाँव (भीलवाड़ा) में पधारे। गुरु महाराज पुर में घाटम जी थापण के यहाँ पर ठहरे और पाँच दिन तक लगातार यज्ञ किया। उस स्थान पर उन्हीं के समय में साथरी का निर्माण किया गया जो आज भी विद्यमान है।

गुरु महाराज की सोलह साथरियों में पुर की साथरी छठे नम्बर की है।

auto_awesomeबेर एवं बड़ का चमत्कार

यहाँ रणधीर जी ने एक दिन दातुन करके बेर की टहनी को कीचड़ में फेक दिया, जो रात भर में अंकुरित हो गया। वर्षों बाद, जब एक वंशज को इसके काँटे से पीड़ा हुई और उसने छाया हेतु बड़ की इच्छा प्रकट की, तो प्रभु का चमत्कार हुआ: उसी रात उस बेर के स्थान पर बड़ का पौधा भी प्रस्फुटित हुआ। आज भी वे दोनों पेड़ एक साथ लगे हुए हैं।

जम्भसार भाग-2 से

बड़ होता तो दर्शन करते, काँटे पीड़ कबहूँ नहीं मरते।

उस कही सोझे तिस ही राता, गई बेर, बड़ भयो प्रभाता।।

स्वामी भगवान प्रकाश

महन्त समेलिया धाम

history_edu
सर्वोच्च बलिदान

खेजड़ली का खडाणा

"भादो सुदी दसवीं वि.स. 1787: अमृता देवी बिश्‍नोई के नेतृत्व में 363 बिश्‍नोई वीरों ने खेजड़ी वृक्षों की रक्षार्थ अपने प्राणों का बलिदान दिया। इसमें बाबल परिवार के 26 सदस्यों ने भी अपनी आहुति दी।"

shield_moon

शहीदों की नामावली

कुल 26 शहीद (22 पुरुष, 4 स्त्रियाँ)

मंगलवार, वि.स. 1787
1. पांचोजी बाबल
2. रूपोजी बाबल
3. आसोजी बाबल
4. गोरधनजी बाबल
5. पदमा खोड़ (धर्मपत्नी)
6. मनोहरजी बाबल
7. सूजोजी बाबल
8. नेती थालोड (धर्मपत्नी सूजोजी)
9. रूगजी बाबल
10. लादूजी बाबल
11. भींवजी बाबल
12. नेतोजी बाबल
13. जैसोजी बाबल
14. तेजोजी बाबल
15. जैसोजी बाबल
16. लाखोजी बाबल
17. सुरजाणी बाई बाबल
18. राहुजी बाबल
19. नृसिंहजी बाबल
20. मेहोजी बाबल
21. कसरोजी बाबल
22. पीथोजी बाबल
23. जेहोजी बाबल
24. समेलजी बाबल
25. सोनी गोदारी (धर्मपत्नी तेजोजी)
26. कुशलोजी बाबल

अमर शहीद सदैव स्मरणीय

वंशावली

बाबल (बिश्‍नोई) वंशावली - विस्तृत विवरण

खेमराज जी बाबल

बाबलसर

बाबल वंश के मूल पुरुष

रणधीर जी बाबल

पड़ियाल

विष्णोई पंथ में दीक्षित, मुकाम मंदिर के प्रथम महंत। वि.सं. 1542 में पड़ियाल गांव बसाया।

हापूजी

हीरा देवी खिलेरण (पीलवा)
हीराजी की बेटी और हरकाजी की पोती
गौरादेवी भांभू

हापूजी का निधन कार्तिक बदी तीज संवत् 1612 को हुआ।

मांडूजी

गवरी देवी सारण (भोजासर)
जगुजी की बेटी, देदोजी की पोती
अंतिया (इतिया) गोदारा (पल्ली)
प्रेमजी की बेटी, रामूजी की पोती
पुत्र:लालो जीलादूजीनाथोजी

मांडू जी का स्वर्गवास कार्तिक सुदी सातम संवत् 1662 को हुआ। माँडूजी की पत्नी अंतिया अपने बेटे नाथोजी के पीछे संवत् 1608 भादवा सुदी आठम सोमवार शाम 6 बजे सती हुई, जो आज 'महासती' के नाम से प्रसिद्ध हैं। भादवा सुदी आठम को इनकी धोक लगती है।

लादूजी

गंवरी गोदारी (पीलवा)
हीराजी की बेटी तथा हरकाजी की पोती

मांडूजी के बेटे। इनका निवास पड़ियाल में रहा।

लालो जी

फिटकासनी (जोधपुर)
गंगा बेनिवाल (भोजासर)
इरोजी की बेटी और मुगलोजी की पोती
नौजी महला (झोलियाली)
धर्मोजी की बेटी, निम्बोजी की पोती
पुत्र:रत्नोजीसमेतलोजी

लालोजी ने फिटकासनी गांव वि.सं. 1617 जेठ सुदी पंचम को बसाया था। लालोजी का स्वर्गवास जेठ सुदी तीज वि.सं. 1677 में हुआ।

रत्नोजी

पामी-पारो गोदारी (कुंभेजी)
पुत्र:जैमली जीजयोजीजोधोजीआसूजीजगमालजी

रत्नोजी के पुत्र जैमल जी ने धर्म कार्यों में अपने प्राण दिए थे, वे फिटकासनी गांव में शहीद हुए थे। बाबलों में इनकी बहुत अधिक मान्यता है। आगे चलकर जयो जी, जोधा जी, आसो जी, जगमाल जी ने की वंशावली चली।

वर्तमान पीढ़ी

अभी रणधीर जी बाबल वंश की 16वीं/17वीं पीढ़ियां चल रही है जो समाज और पर्यावरण की सेवा में संलग्न हैं।

"जो अपने सपनों को पूरा करने का साहस करता है, वह हर मुश्किल को पार कर सकता है।"

नेतृत्व

हमारा नेतृत्व

अध्यक्ष श्री रमेश बाबल
"हमारा मिशन मानवता की सेवा उसी भक्ति के साथ करना है जो संत रणधीर जी की प्रकृति के लिए थी।"

अध्यक्ष श्री रमेश बाबल

अध्यक्ष, संत श्री रणधीर जी बाबल सेवा संस्थान

जयकिशन बिश्‍नोई
"संस्थान के माध्यम से समाज में शिक्षा और संस्कारों का बीजारोपण करना ही हमारा मुख्य लक्ष्य है।"

जयकिशन बिश्‍नोई

महासचिव, संत श्री रणधीर जी बाबल सेवा संस्थान (बासनी निकुबा)

हमारा संकल्प

संस्था के उद्देश्य

समिति का कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण राजस्थान राज्य की राजस्व सीमा तक है। हमारे मुख्य उद्देश्य निम्न हैं:

1

श्री जम्भेश्वर भगवान के दर्शन एवं शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करना।

2

श्री जम्भेश्वर भगवान् के परम शिष्य श्री रणधीरजी बाबल की विचारधारा एवं शिक्षा से सम्बन्धित समस्त कार्य करना।

3

श्री रणधीरजी बाबल के नाम से मेला प्रारम्भ एवं संचालन करना।

4

बाबल गौत्र के इतिहास एवं वंशावली को संग्रहित एवं प्रकाशित करना।

5

पर्यावरण एवं पारिस्थितिक संरक्षण का कार्य करना।

6

समाज में व्याप्त कुरीतियों का उन्मूलन करना।

7

बालक, बालिकाओं, महिलाओं एवं प्रौढ़जन के शिक्षा एवं विकास सम्बन्धि कार्य करना।

8

गरीब एवं आर्थिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के उत्थान एवं विकास का कार्य करना।

9

विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय को प्रारम्भ एवं उनका संचालन करना।

10

छात्र-छात्राओं के लिए छात्रावास, वाचनालय प्रारम्भ करना एवं उनका संचालन करना।

11

शिक्षा, स्वास्थय, चिकित्सा, खेती के विकास से सम्बन्धित कार्य करना।

12

विश्नोई पंथ के साहित्य एवं विकास हेतु समस्त कार्य करना।

13

जनहित से सम्बधित अन्य कार्य करना।

groupsकार्यकारिणी का गठन

संस्थान के कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक प्रबंध कार्यकारिणी का गठन किया जाएगा जिसमें कुल 31 पदाधिकारी एवं सदस्य होंगे:

  • अध्यक्ष
    (1)
  • उपाध्यक्ष
    (4)
  • महासचिव
    (1)
  • सचिव
    (4)
  • कोषाध्यक्ष
    (1)
  • सह-कोषाध्यक्ष
    (1)
  • प्रवक्ता
    (1)
  • संगठन सचिव
    (2)
  • कार्यकारिणी सदस्य
    (16)

verified_userसदस्यता एवं नियम

पात्रता / Eligibility

योग्यता: सदस्य बालिग होना चाहिए, पूर्ण शाकाहारी, वन्य जीवों का शिकार न करने वाला एवं श्री जम्भेश्वर भगवान के सिद्धांतों में अटूट विश्वास रखने वाला होना चाहिए।

सदस्यता शुल्क / Membership Fee

आजीवन सदस्य₹11,000/-
साधारण सदस्य₹1,100/-

नोट: सदस्यता निष्कासन, साधारण सभा, और बैठकों के नियम 'संस्थान विधान नियमावली' के अनुसार संचालित होंगे।

भविष्य का संकल्प

आगामी योजनाएं

library_books

“रणधीर जी बाबल” लाइब्रेरी निर्माण

बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए सभी गांवों में आधुनिक लाइब्रेरी।

location_onसभी गांवों में
park

रणधीर जी पार्क एवं प्याऊ

पर्यावरण संरक्षण हेतु पार्क का विकास एवं राहगीरों के लिए प्याऊ निर्माण।

import_contacts

ऐतिहासिक पुस्तक प्रकाशन

रणधीर जी बाबल व बाबल इतिहास पर विस्तृत पुस्तक का प्रकाशन।

architecture

रणधीर जी की छतरी निर्माण

मुकाम मंदिर पर भव्य छतरी का निर्माण - सामूहिक एकता एवं प्रयास की आवश्यकता।

location_onमुकाम
military_tech

रणधीर जी बाबल व खंगार बा पुरस्कार

समाज के प्रति उत्कृष्ट सेवा हेतु पुरस्कारों का शुभारंभ।

castle

खेजड़ली मंदिर पुनः निर्माण एवं जीर्णोद्धार

शहीदों की पावन स्मृति में खेजड़ली मंदिर का भव्य पुनः निर्माण एवं परिसर का नवीनीकरण।

location_onखेजड़ली

हमे प्रयास करने से डरना नहीं चाहिए। ज़्यादा से ज़्यादा हम असफल होगे और असफल तो वो हम अभी भी बिना प्रयास के हैं। इसलिए कोशिश अवश्य करनी चाहिए।

आपका सहयोग, उज्ज्वल भविष्य

कोशिश न करना पहले से ही असफलता को स्वीकार करने जैसा है, जबकि प्रयास करने से जीतने की संभावना हमेशा बनी रहती है।