परंपरा का सम्मान
मानवता की सेवा
" संत श्री रणधीर जी बाबल के कालातीत ज्ञान में निहित, हम जरूरतमंदों के लिए आशा के पुल बनाते हैं।"

गुरु जाम्भोजी के पाटवी शिष्य रणधीरजी बाबल और बाबल वंशावली
विक्रम संवत् 1508 में गुरु जाम्भोजी का अवतार हुआ और गुरु जाम्भोजी ने महानिर्वाण मिंगसर बदी नवमी विक्रम संवत् 1593 को प्राप्त किया था। गुरु जाम्भोजी ने आजीवन लोगों को अपने शब्दों द्वारा उपदेश दिया और जीवन जीने की सही विधि बताई। रणधीर जी बाबल जम्भेश्वर भगवान के पाटवी व हजूरी शिष्य थे और हमेशा उनके साथ रहते थे।
वि.स. 1508
गुरु जाम्भोजी का अवतार (Guru Jambhoji Avatar)
पोशाक प्रसंग और महंती
कवि साहबरामजी राहड़ ने अपने ग्रंथ जम्भसार में लिखा है कि जब गुरु जाम्भोजी अंतर्ध्यान होने लगे तो उनके शिष्यों ने पूछा - महाराज हमारा क्या होगा? पंथ का धणी कौन होगा? तब गुरु जाम्भोजी ने चार संतों को अलग-अलग पोशाक दी और अलग-अलग गद्दी प्रदान की।
"रेडो जी काली पोशाका, किये महन्त सिर पर कर रखा। लाल पोशाका महन्त न्यालो, जम्भगुरु आज्ञा में चालो। रणधीर जी भगवें के महन्ता, मदी दीन्ही सब मिल संतां। चौथी मदी श्वेत पोशाका, आपणै पास लीवी हर सखा।"
वि.स. 1541
पड़ियाल आगमन और तपस्या - रणधीर जी बाबल बाबलसर गाँव के जाट थे। वि.स. 1541 मारवाड़ में भयंकर अकाल पड़ा तब वे अपने परिवार सहित मालवा जा रहे थे। तब इसी रास्ते में गुरु महाराज श्री के सम्पर्क में आये और उनके शब्दोपदेश सुने तत्पश्चात बिश्नोई पंथ में दीक्षित हो गये। रणधीर जी बाबल ने वि.स. 1542 में पड़ियाल गांव (फलोदी) बसाया था। कालान्तर में वे एवं उनका परिवार पड़ियाल में रहने लगे।
वि.स. 1593
मुकाम मंदिर निर्माण - 19 वीं शताब्दी के एक हस्तलिखित गुटके से पता चलता है कि संवत् 1593 पोष सुदी दूज सोमवार को मंदिर की नींव लगी थी एवं संवत् चैत्र सुदी सातम को मंदिर सम्पूर्ण हुआ। प्राचीन मंदिर का निर्माण गुरू जाम्भोजी के शिष्य रणधीर जी बाबल ने किया था। रणधीरजी को मंदिर का निर्माण में लगभग चार वर्ष लगे थे। वर्तमान में मुकाम मंदिर का जो गर्भगृह है, वह रणधीरजी बाबल का ही बनाया हुआ है।
खेजड़ली का खडाणा (बलिदान)
भादो सुदी दसवीं मंगलवार वि.स. 1787 में खेजड़ली गांव में खेजड़ी वृक्षों की रक्षार्थ शाका हुआ, जिसमें बाबलों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया और आत्म बलिदान दिया। कुल 363 शहीदों में से 26 बाबल परिवार के सदस्य थे।
अध्यक्ष का संदेश

"हमारा मिशन सरल लेकिन गहरा है: मानवता की सेवा उसी भक्ति के साथ करना जो संत रणधीर जी की प्रकृति और सभी जीवित प्राणियों के लिए थी। शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कार केवल सेवाएं नहीं हैं, वे ईश्वर के प्रति हमारा समर्पण हैं।"
श्री रमेश बाबल
अध्यक्ष, एसएसआरजेबी सेवा संस्थान
संस्था के उद्देश्य
समिति का कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण राजस्थान राज्य की राजस्व सीमा तक है। हमारे मुख्य उद्देश्य निम्न हैं:
श्री जम्भेश्वर भगवान के दर्शन एवं शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करना।
श्री जम्भेश्वर भगवान् के परम शिष्य श्री रणधीरजी बाबल की विचारधारा एवं शिक्षा से सम्बन्धित समस्त कार्य करना।
श्री रणधीरजी बाबल के नाम से मेला प्रारम्भ एवं संचालन करना।
बाबल गौत्र के इतिहास एवं वंशावली को संग्रहित एवं प्रकाशित करना।
पर्यावरण एवं पारिस्थितिक संरक्षण का कार्य करना।
समाज में व्याप्त कुरीतियों का उन्मूलन करना।
बालक, बालिकाओं, महिलाओं एवं प्रौढ़जन के शिक्षा एवं विकास सम्बन्धि कार्य करना।
गरीब एवं आर्थिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के उत्थान एवं विकास का कार्य करना।
विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय को प्रारम्भ एवं उनका संचालन करना।
छात्र-छात्राओं के लिए छात्रावास, वाचनालय प्रारम्भ करना एवं उनका संचालन करना।
शिक्षा, स्वास्थय, चिकित्सा, खेती के विकास से सम्बन्धित कार्य करना।
विश्नोई पंथ के साहित्य एवं विकास हेतु समस्त कार्य करना।
जनहित से सम्बधित अन्य कार्य करना।
groupsकार्यकारिणी का गठन
संस्थान के कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक प्रबंध कार्यकारिणी का गठन किया जाएगा जिसके कुल 31 पदाधिकारी एवं सदस्य होंगे:
- अध्यक्ष (1)
- उपाध्यक्ष (4)
- महासचिव (1)
- सचिव (4)
- कोषाध्यक्ष (1)
- सह-कोषाध्यक्ष (1)
- प्रवक्ता (1)
- संगठन सचिव (2)
- कार्यकारिणी सदस्य (16)
verified_userसदस्यता एवं नियम
योग्यता: सदस्य बालिग होना चाहिए, शाकाहारी होना चाहिए, वन्य जीवों का शिकार न करने वाला एवं श्री जम्भेश्वर भगवान के सिद्धांतों में विश्वास रखने वाला होना चाहिए।
सदस्यता शुल्क
- आजीवन सदस्य₹11,000/-
- साधारण सदस्य₹1,100/-
नोट: सदस्यता निष्कासन, साधारण सभा, और बैठकों के नियम 'संघ विधान नियमावली' के अनुसार संचालित होंगे।
हमारी सेवा विरासत में शामिल हों
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